सप्तमी से शुरू होती है नवरात्रि की परंपरा, शरद पूर्णिमा पर रावण दहन और दशहरा मेले में जुटते हैं श्रद्धालु
गणेशदत्त राजू तिवारी कि रिपोर्ट
मल्हार। धार्मिक एवं ऐतिहासिक नगरी मल्हार में शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां सतबहिनिया मंदिर में आस्था का विशेष नजारा देखने को मिला। शारदीय नवरात्रि के दौरान भक्तों द्वारा प्रज्वलित कराए गए 51 मनोकामना ज्योति कलशों का विधि-विधान से विसर्जन किया गया। इस अवसर पर आयोजित दशहरा मेले में आसपास के गांवों सहित दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचे और मां सातो बहिनिया के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
मल्हार के मां सतबहिनिया मंदिर में नवरात्रि की शुरुआत सप्तमी तिथि से होती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत भैना समाज के मलेछ भैना द्वारा की गई थी। तभी से यह धार्मिक आयोजन स्थानीय आस्था और लोक परंपरा का हिस्सा बना हुआ है। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के साथ ज्योति कलश प्रज्वलित कराते हैं और शरद पूर्णिमा पर ज्योति-जंवारा विसर्जन के साथ पूजा का समापन होता है।
रावण दहन के साथ दशहरा मेले का आयोजन
मल्हार में शरद पूर्णिमा का पर्व दशहरा उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर रावण के पुतले का दहन किया जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। रावण दहन के बाद लोग मेले में घूमकर खरीदारी और मनोरंजन का आनंद लेते हैं। परिवारों और बच्चों की मौजूदगी से मेले में उत्सवी माहौल बना रहता है।
मल्हार की लोक संस्कृति और आस्था का प्रतीक
शरद पूर्णिमा पर लगने वाला यह मेला मल्हार की खास पहचान है। यहां धार्मिक आस्था के साथ लोक संस्कृति और आपसी मेल-मिलाप की परंपरा भी देखने को मिलती है। स्थानीय श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां सातो बहिनिया के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। इसी विश्वास के चलते हर वर्ष भक्त माता के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं।
मां सतबहिनिया मंदिर में ज्योति-जंवारा विसर्जन, रावण दहन और दशहरा मेले का यह आयोजन मल्हार की धार्मिक परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
